केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला ने जारी की एडवाइजरी, मौसम बना बीमारी के फैलने के लिए अनुकूल
शिमला, 13 जुलाई। हिमाचल प्रदेश के आलू उत्पादक किसानों के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी जारी की गई है। केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला ने राज्य में पिछेता झुलसा (लेट ब्लाइट) बीमारी के बढ़ते खतरे को देखते हुए किसानों से तुरंत सतर्क रहने और समय पर बचाव के उपाय अपनाने की अपील की है।
संस्थान द्वारा विकसित इंडो-ब्लाइटकास्ट (पैन इंडिया) पूर्वानुमान मॉडल के अनुसार प्रदेश में मौजूदा मौसम इस बीमारी के फैलने के लिए बेहद अनुकूल है। यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो फसल को भारी नुकसान हो सकता है।
बीमारी न दिखे तो भी करें बचाव
संस्थान के पौध संरक्षण संभाग के अध्यक्ष डॉ. संजीव शर्मा ने बताया कि जिन खेतों में अभी तक बीमारी के लक्षण दिखाई नहीं दिए हैं और फफूंदनाशक का छिड़काव नहीं किया गया है, वहां मैन्कोजेब या क्लोरोथलोनील युक्त फफूंदनाशक का 0.2–0.25 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करें। इसके लिए प्रति हेक्टेयर लगभग 2 से 2.5 किलोग्राम दवा 1000 लीटर पानी में मिलाने की सलाह दी गई है।
लक्षण दिखें तो तुरंत करें यह छिड़काव
यदि खेत में पिछेता झुलसा (लेट ब्लाइट) के लक्षण दिखाई देने लगें तो विशेषज्ञों ने डाइमेथोमोर्फ, अमेटोक्ट्रडीन + डाइमेथोमोर्फ, डाइमेथोमोर्फ + मैन्कोजेब, फ्लुपिकोलिड + प्रोपामोकार्ब या अजोक्षिस्ट्रोबिन + टेबुकोनाजोल जैसे अनुशंसित फफूंदनाशकों का निर्धारित मात्रा में छिड़काव करने की सलाह दी है।
हर 10 दिन बाद दोहराएं छिड़काव
विशेषज्ञों के अनुसार फफूंदनाशक का छिड़काव सामान्यतः 10 दिन के अंतराल पर दोहराया जा सकता है। हालांकि बीमारी की गंभीरता के अनुसार इस अवधि में बदलाव किया जा सकता है। साथ ही एक ही फफूंदनाशक का लगातार उपयोग न करें और प्रत्येक छिड़काव में 0.1 प्रतिशत स्टिकर (लगभग 1 मिली प्रति लीटर पानी) का प्रयोग अवश्य करें।
जल निकासी और खरपतवार नियंत्रण भी जरूरी
संस्थान ने किसानों को खेतों में उचित जल निकासी व्यवस्था बनाए रखने और खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी है, ताकि बीमारी का प्रसार रोका जा सके और फसल सुरक्षित रहे।













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