नई पिंक प्रजाति के हाईब्रिड बीज से कम समय में ज्यादा उत्पादन का दावा, किसान एक माह में ले सकेंगे दो से तीन क्रॉप
सोलन | हिमालयन डॉन, मशरूम उत्पादन से जुड़े किसानों के लिए बड़ी राहत की खबर है। अब ढिंगरी मशरूम की फसल तैयार होने के लिए किसानों को करीब एक से डेढ़ महीने तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। मशरूम अनुसंधान एवं निदेशालय (डीएमआर), सोलन के वैज्ञानिकों ने ढिंगरी मशरूम की पिंक प्रजाति का हाईब्रिड बीज तैयार कर ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसके माध्यम से महज आठ दिन में पहली क्रॉप तैयार करने में सफलता मिली है।
नई तकनीक से न केवल फसल तैयार होने का समय कम होगा, बल्कि उत्पादन भी पहले की तुलना में अधिक होने की उम्मीद है। वर्तमान तकनीक में ढिंगरी मशरूम की फसल तैयार होने में सामान्य तौर पर 28 से 40 दिन लगते हैं। ऐसे में नई तकनीक मशरूम उत्पादकों के लिए उत्पादन चक्र को तेज करने के साथ उनकी आमदनी बढ़ाने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
एक माह में दो से तीन क्रॉप लेने की संभावना
डीएमआर के वैज्ञानिकों के अनुसार नई तकनीक के माध्यम से किसान कम समय में अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकेंगे। इससे एक महीने के भीतर दो से तीन क्रॉप लेने की संभावना बनेगी। उत्पादन चक्र छोटा होने से किसानों को कम समय में बाजार में मशरूम उपलब्ध कराने का अवसर मिलेगा और इससे उनकी आय में भी बढ़ोतरी हो सकती है।
डीएमआर सोलन में इस तकनीक पर पिछले करीब एक वर्ष से शोध चल रहा था, जो अब सफल हुआ है। वैज्ञानिकों ने ढिंगरी मशरूम की पिंक प्रजाति के हाईब्रिड बीज को विकसित करने के साथ इसके उत्पादन को कम समय में प्राप्त करने की तकनीक पर काम किया है।
स्वाद के साथ औषधीय और पौष्टिक गुणों से भरपूर है ढिंगरी
ढिंगरी मशरूम को उसके बेहतर स्वाद के साथ-साथ औषधीय और पौष्टिक गुणों के लिए भी जाना जाता है। इसमें प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। यही कारण है कि इसकी मांग घरेलू बाजार के साथ-साथ बड़े होटल और रेस्टोरेंट में भी रहती है।
बाजार में ढिंगरी मशरूम की कीमत सामान्य तौर पर 100 से 200 रुपये प्रति किलो तक बताई जाती है। देश में बटन मशरूम के बाद ढिंगरी मशरूम प्रमुख रूप से उत्पादित की जाने वाली प्रजातियों में शामिल है।
अरबों रुपये का है मशरूम कारोबार
भारत में हर वर्ष करीब 3,010 मीट्रिक टन से अधिक मशरूम का उत्पादन होने का उल्लेख किया गया है। इससे करीब चार अरब रुपये से अधिक का कारोबार होता है। हिमाचल प्रदेश में भी मशरूम उत्पादन से करीब दो करोड़ रुपये का कारोबार होने की जानकारी दी गई है।
ऐसे में उत्पादन अवधि कम करने वाली यह नई तकनीक छोटे और मध्यम किसानों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि किसान एक ही समय में अधिक क्रॉप लेने में सफल होते हैं तो सीमित स्थान और संसाधनों से उत्पादन बढ़ाने की संभावनाएं भी मजबूत होंगी।
औषधीय पौधों के अपशिष्ट पर भी सफल रहा प्रयोग
डीएमआर सोलन के वैज्ञानिक इससे पहले औषधीय पौधों के अपशिष्टों पर ढिंगरी मशरूम उगाने का प्रशिक्षण और प्रयोग भी सफलतापूर्वक कर चुके हैं। अदरक और तुलसी के अपशिष्ट पर किए गए प्रयोग में करीब 28 से 32 दिन बाद क्रॉप प्राप्त हुई थी।
अब वैज्ञानिक मसालों के अपशिष्ट पर भी ढिंगरी मशरूम उत्पादन की दिशा में शोध कर रहे हैं। इसके लिए डीएमआर के विशेषज्ञ राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केंद्र (एनआरसीएसएस), अजमेर के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।
जीरा, सौंफ और धनिया के औषधीय गुणों का भी मिलेगा लाभ
मसालों के अपशिष्ट पर ढिंगरी मशरूम उगाने का प्रयोग सफल होने पर इसका एक अतिरिक्त लाभ उपभोक्ताओं को भी मिल सकता है। वैज्ञानिकों का उद्देश्य ऐसे मशरूम तैयार करना है, जिनमें मशरूम के पोषक तत्वों के साथ जीरा, सौंफ और धनिया जैसे मसालों के औषधीय गुणों का लाभ भी मिल सके।
शोध सफल होने के बाद इस तकनीक का प्रशिक्षण देशभर के मशरूम उत्पादकों और किसानों को देने की योजना है। इससे कृषि अपशिष्ट के बेहतर उपयोग के साथ किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
राष्ट्रीय खुंब मेले में पहली बार प्रदर्शित होगी नई प्रजाति
डीएमआर की ओर से विकसित की गई नई पिंक प्रजाति और हाईब्रिड बीज को पहली बार राष्ट्रीय खुंब मेले में देशभर से आने वाले मशरूम उत्पादकों के सामने प्रदर्शित किया जाएगा। इससे किसानों और मशरूम उत्पादकों को इस नई तकनीक की जानकारी मिल सकेगी।
डीएमआर के कार्यकारी निदेशक डॉ. ब्रिज लाल अत्री के अनुसार, ढिंगरी मशरूम के हाईब्रिड बीज को तैयार करने में विशेषज्ञों को सफलता मिली है। उन्होंने बताया कि नई तकनीक से आठ दिन में प्राप्त हुई क्रॉप पहले की तकनीक की तुलना में करीब दो गुना अधिक रही है। उन्होंने कहा कि इस शोध को पूरा होने में करीब एक वर्ष लगा है और राष्ट्रीय खुंब मेले में पहली बार नई पिंक प्रजाति और हाईब्रिड बीज को देशभर के मशरूम उत्पादकों के लिए प्रदर्शित किया जाएगा।
किसानों के लिए क्यों खास है यह तकनीक?
- 28-40 दिन की जगह करीब 8 दिन में क्रॉप तैयार होने की संभावना
- एक महीने में दो से तीन क्रॉप लेने का अवसर
- कम समय में अधिक उत्पादन की संभावना
- किसानों की आय बढ़ाने में मददगार हो सकती है तकनीक
- कृषि और मसाला अपशिष्ट के बेहतर इस्तेमाल का रास्ता
- देशभर के मशरूम उत्पादकों को प्रशिक्षण देने की योजना









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