बजौरा (कुल्लू): हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में पारंपरिक खेती के साथ-साथ अब नकदी फसलों, विशेषकर लहसुन और मसालों की व्यावसायिक खेती (Commercial Farming) को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ी पहल की गई है। क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र, बजौरा में आयोजित दो दिवसीय जिला स्तरीय संगोष्ठी में वैज्ञानिकों ने किसानों को आधुनिक तकनीक और बीज उत्पादन के रहस्यों से रूबरू करवाया।
MIDH परियोजना के तहत विशेष प्रशिक्षण
डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा इस संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) परियोजना के अंतर्गत संचालित किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य किसानों की आय को दोगुना करना और उन्हें बाजार की मांग के अनुसार तैयार करना है।
संगोष्ठी में कुल्लू जिले के विभिन्न कोनों से आए 100 से अधिक प्रगतिशील किसानों ने हिस्सा लिया। किसानों की भारी उपस्थिति यह दर्शाती है कि घाटी में अब किसान पारंपरिक फसलों के बजाय लहसुन और अन्य मसालों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।
कुल्लू की जलवायु लहसुन के लिए वरदान
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कुल्लू के अध्यक्ष डॉ. सुरेंद्र ठाकुर ने मुख्य अतिथि के रूप में किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि कुल्लू घाटी की कृषि-जलवायु परिस्थितियां लहसुन और मसाला फसलों के लिए अत्यंत अनुकूल हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि किसान वैज्ञानिक पद्धतियों और उन्नत किस्मों का चुनाव करें, तो वे कम लागत में अधिक लाभ कमा सकते हैं। उन्होंने गुणवत्तापूर्ण बीज और पोषक तत्व प्रबंधन को सफल खेती का मूल मंत्र बताया।
गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन पर जोर
बीज विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एन.के. भरत ने कहा कि किसी भी सफल खेती की नींव उसका बीज होता है। उन्होंने मसाला फसलों की बढ़ती वैश्विक मांग को देखते हुए एक मजबूत बीज आपूर्ति श्रृंखला (Seed Supply Chain) तैयार करने की आवश्यकता जताई। वहीं, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अशोक ठाकुर ने लहसुन की विदेशी किस्मों (Exotic Spices) और प्रमाणित बीज उत्पादन की संभावनाओं पर विस्तृत जानकारी साझा की।
तकनीकी सत्रों में मिली व्यावहारिक जानकारी
दो दिनों तक चले इस शिविर में वैज्ञानिकों ने कई महत्वपूर्ण विषयों पर किसानों की शंकाओं का समाधान किया:
- उन्नत किस्में: लहसुन और मसालों की ऐसी किस्में जो रोगों से लड़ने में सक्षम हों।
- पौध संरक्षण: कीटों और बीमारियों से फसल को बचाने के आधुनिक तरीके।
- जल प्रबंधन: सिंचाई की नई तकनीकें जिससे पानी की बचत हो और पैदावार बढ़े।
- फसलोपरांत प्रबंधन: फसल कटने के बाद उसका भंडारण और बेहतर विपणन (Marketing) ताकि किसानों को उचित दाम मिल सके।
किसान-वैज्ञानिक संवाद और सम्मान
संगोष्ठी का मुख्य आकर्षण किसान-वैज्ञानिक संवाद सत्र रहा। इसमें किसानों ने बीज की उपलब्धता, भंडारण की समस्या और सरकारी योजनाओं के लाभ से जुड़े सीधे सवाल विशेषज्ञों से पूछे। विशेषज्ञों ने न केवल उनके जवाब दिए बल्कि क्षेत्र-विशिष्ट समाधान भी सुझाए।
कार्यक्रम के दौरान मसाला फसलों के उत्पादन में नवाचार (Innovation) करने वाले तीन प्रगतिशील किसानों को सम्मानित भी किया गया। समापन के अवसर पर सभी प्रतिभागियों को अनुसंधान केंद्रों के खेतों का भ्रमण कराया गया, जहां उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक प्रबंधन का प्रदर्शन देखा।












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