करसोग (मंडी)। कोविड-19 महामारी के दौरान नौकरी छूटना जहां कई लोगों के लिए संकट बन गया, वहीं करसोग उपमंडल की ग्राम पंचायत सोमाकोठी के युवा किसान बालकृष्ण ने इसे अवसर में बदल दिया। निजी कंपनी की नौकरी जाने के बाद उन्होंने आधुनिक बागवानी का रास्ता चुना और आज स्ट्रॉबेरी की खेती से न केवल आत्मनिर्भर बने हैं, बल्कि अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन गए हैं।
प्रदेश सरकार द्वारा कृषि एवं बागवानी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए संचालित योजनाओं, आधुनिक तकनीक और गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री का लाभ उठाकर बालकृष्ण ने लगभग एक बीघा भूमि पर स्ट्रॉबेरी की व्यावसायिक खेती शुरू की। कठिन पहाड़ी परिस्थितियों के बावजूद उनकी मेहनत रंग लाई और आज उनके खेतों में तैयार होने वाली स्ट्रॉबेरी स्थानीय बाजार में अपनी गुणवत्ता और स्वाद के कारण खास पहचान बना चुकी है।
300 से 500 रुपये किलो तक मिल रहा भाव
बालकृष्ण अपनी स्ट्रॉबेरी स्वयं कार के माध्यम से स्थानीय बाजारों तक पहुंचाकर सीधे उपभोक्ताओं को बेचते हैं। इससे उन्हें बिचौलियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता और बेहतर दाम मिलते हैं। वर्तमान में स्थानीय बाजार में स्ट्रॉबेरी 300 से 500 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रही है। इससे उन्हें एक बीघा भूमि से हर महीने लगभग 12 से 15 हजार रुपये की अतिरिक्त आय हो रही है, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है।
अब तैयार की दो लाख पौधों की नर्सरी
बालकृष्ण भविष्य में अपने इस व्यवसाय का विस्तार भी कर रहे हैं। उन्होंने लगभग दो लाख स्ट्रॉबेरी पौधों की नर्सरी तैयार की है। इनमें से करीब एक लाख पौधे अपने खेतों में लगाए जाएंगे, जबकि शेष पौधे क्षेत्र के अन्य किसानों को उपलब्ध कराए जाएंगे, ताकि वे भी स्ट्रॉबेरी की खेती अपनाकर बेहतर आय अर्जित कर सकें।
ब्लूबेरी, खुबानी और प्लम की खेती की भी तैयारी
स्ट्रॉबेरी की सफलता के बाद अब बालकृष्ण ब्लूबेरी, एप्रीकॉट (खुबानी), प्लम सहित अन्य उच्च मूल्य वाली फल फसलों की खेती की दिशा में भी काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि आधुनिक तकनीक, सही फसल चयन और बाजार की समझ के साथ कम भूमि पर भी खेती को लाभदायक व्यवसाय बनाया जा सकता है।
सरकारी योजनाओं से बढ़ रहा किसानों का आत्मविश्वास
प्रदेश सरकार कृषि एवं बागवानी को लाभकारी बनाने के लिए किसानों को आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री और अन्य सुविधाएं उपलब्ध करा रही है। इन प्रयासों का सकारात्मक प्रभाव अब ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है और बड़ी संख्या में युवा आधुनिक खेती को स्वरोजगार के रूप में अपना रहे हैं।
बालकृष्ण की सफलता यह साबित करती है कि यदि मेहनत, नई सोच और सरकारी योजनाओं का सही उपयोग किया जाए, तो खेती केवल आजीविका का साधन नहीं बल्कि समृद्धि का मजबूत आधार बन सकती है। उनकी कहानी पहाड़ के युवाओं के लिए एक प्रेरक संदेश है कि विपरीत परिस्थितियों में भी नई शुरुआत कर सफलता हासिल की जा सकती है।












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