लेखक: श्री शैलेश कुमार सिंह (सचिव, ग्रामीण विकास विभाग, भारत सरकार)
लोकतंत्र में लोकनीति पर सार्वजनिक बहस न केवल स्वाभाविक है, बल्कि अनिवार्य भी है। ग्रामीण परिवारों की आजीविका को प्रभावित करने वाले कानूनों की कड़ाई से समीक्षा होनी चाहिए, लेकिन यह समीक्षा तथ्यों और प्रावधानों के गहन अध्ययन पर आधारित हो, न कि पुराने अनुभवों से उपजे डर पर। हाल ही में चर्चा में आए ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून 2025’ की आलोचनाएं अक्सर इसी भ्रम का शिकार हो जाती हैं।
पुराने ढांचे की कमियां और सुधार की जरूरत
पिछले दो दशकों से रोजगार गारंटी कानून ने ग्रामीण आय को स्थिरता दी है, विशेषकर कोविड-19 जैसे संकट के समय। लेकिन समय के साथ इसकी ढांचागत कमियां भी सामने आईं। मजदूरी भुगतान में देरी, प्रक्रियात्मक जटिलताएं, बेरोजगारी भत्ते का निष्प्रभावी होना और राज्यों के बीच प्रशासनिक क्षमता का बड़ा अंतर—ये कुछ ऐसी चुनौतियां थीं जिन्होंने धन की बर्बादी और भ्रष्टाचार (फर्जी जॉब कार्ड, हाजिरी में हेरफेर) को बढ़ावा दिया।
मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि सुधार क्यों किए गए, बल्कि यह है कि क्या नया फ्रेमवर्क इन खामियों को दूर करता है?
नया कानून: डिलीवरी और जवाबदेही पर केंद्रित
नया कानून उन कमियों को दूर करने के लिए बनाया गया है जिन्होंने व्यवस्था की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया था। इसमें प्रमुख बदलाव निम्नलिखित हैं:
- सत्यापित पंजीकरण: कमजोर परंपरागत प्रणालियों की जगह अब सत्यापित कामगार पंजीकरण होगा।
- मजदूरी की समय सीमा: भुगतान में देरी के लिए स्वतः मुआवजे (Auto-compensation) का प्रावधान किया गया है।
- भत्ते की सुलभता: उन पेचीदा शर्तों को हटा दिया गया है जो बेरोजगारी भत्ते को कामगारों की पहुंच से दूर रखती थीं।
- मजबूत शिकायत निवारण: समयबद्ध जवाबदेही के साथ शिकायत निपटान प्रणाली को सुदृढ़ किया गया है।
100 से बढ़ाकर 125 दिन का रोजगार
आलोचनाओं के विपरीत, नए कानून ने रोजगार के अधिकार को न केवल बरकरार रखा है, बल्कि इसका दायरा 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया है। पुराना मॉडल अक्सर संकट आने के बाद सक्रिय होता था, जबकि नया फ्रेमवर्क योजनाबद्ध है, जो पहले से कार्य सौंपने (Forecasting) के सिद्धांत पर काम करता है।
राज्यों के बीच असंतुलन का समाधान
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को पहले के ढांचे में अपेक्षाकृत कम लाभ मिल पाया, क्योंकि पुरानी व्यवस्था केवल ‘मांग’ पर आधारित थी, जो बेहतर प्रशासनिक क्षमता वाले राज्यों के पक्ष में झुक जाती थी। नया कानून इसे ‘विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं’ से जोड़ता है, जहाँ स्थानीय मांग और सुनिश्चित फंडिंग का तालमेल होगा। संसाधनों का आवंटन अब निष्पक्ष मानकों पर आधारित होगा, जिससे राज्यों के बीच पारदर्शिता बढ़ेगी।
साझा जिम्मेदारी और वित्तीय ढांचा
राज्यों द्वारा खर्च का हिस्सा उठाने की आलोचना पर स्पष्ट करते हुए लेखक बताते हैं कि यह केंद्र-प्रायोजित योजनाओं के पुराने नियमों के अनुरूप ही है। उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों (जैसे हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) के लिए 90:10 का अनुपात जारी रखा गया है। साथ ही, प्रशासनिक खर्च को 6% से बढ़ाकर 9% किया गया है ताकि राज्य अपनी जमीनी मशीनरी को मजबूत कर सकें।
कृषि और बाजार का संतुलन
खेती के व्यस्त सीजन के दौरान योजना को कुछ समय के लिए रोकने का प्रावधान एक सोची-समझी आर्थिक समझदारी है। इसका उद्देश्य कृषि कार्यों के लिए श्रमिकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है, ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संतुलन न बिगड़े। यह किसी भी तरह से कामगारों के 125 दिनों के अधिकार को कम नहीं करता है।
‘विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम’ रोजगार गारंटी को खत्म नहीं, बल्कि उसे सशक्त और आधुनिक बनाता है। यह सुधार सामाजिक सुरक्षा से पीछे हटना नहीं है, बल्कि काम के वादे को वास्तविक, भरोसेमंद और गरिमापूर्ण बनाने का एक ईमानदार प्रयास है।













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