हिमालयन डॉन, शिमला। हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादकों के लिए राज्य सरकार ने एक बेहद राहत भरी खबर दी है। सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी – MSP) योजना के तहत सी-ग्रेड सेब की खरीद व्यवस्था में एक ऐतिहासिक और बड़ा बदलाव करने का निर्णय लिया है। नई व्यवस्था के तहत अब एचपीएमसी (हिमाचल प्रदेश हॉर्टिकल्चरल प्रोड्यूस मार्केटिंग एंड प्रोसेसिंग कॉर्पोरेशन) की छोटी गाड़ियां सीधे गांवों और लिंक रोड तक पहुंचकर किसानों से सी-ग्रेड सेब की खरीद करेंगी।
सरकार के इस कदम से बागवानों को अपनी उपज को मुख्य सड़क तक ढोने की मजबूरी से मुक्ति मिलेगी। इससे न केवल उनके परिवहन में होने वाली परेशानी दूर होगी, बल्कि अतिरिक्त लेबर और मालभाड़े के खर्च से भी भारी राहत मिलेगी।
पिछले सीजन के नुकसान से लिया सबक गौरतलब है कि पिछले सेब सीजन के दौरान राज्य में लगातार हुई भारी बारिश और भूस्खलन के कारण कई ग्रामीण व संपर्क सड़कें लंबे समय तक बंद रही थीं। इसके चलते दूरदराज के बगीचों से सी-ग्रेड सेब समय पर नहीं उठाया जा सका था। परिणामस्वरूप, बड़ी मात्रा में सेब बागानों के अंदर और सड़कों के किनारे ही सड़ कर खराब हो गया था, जिससे किसानों और एचपीएमसी दोनों को ही भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था। इसी संकटपूर्ण स्थिति को देखते हुए सरकार ने भविष्य में ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति रोकने के लिए परिवहन व्यवस्था में सुधार का यह अहम फैसला लिया है।
टेंडर नियमों में संशोधन, दुर्गम क्षेत्रों के बागवानों को सीधा लाभ इस नई व्यवस्था को अमलीजामा पहनाने के लिए परिवहन से जुड़े टेंडर नियमों में आवश्यक संशोधन किए गए हैं। इसके तहत अब छोटी गाड़ियों को भी लिंक रोड और अंदरूनी गांवों तक जाकर सेब एकत्र करने की आधिकारिक अनुमति मिल सकेगी। इससे अब किसानों को मजदूर लगाकर सेब की बोरियां मुख्य सड़क तक पहुंचाने की जरूरत नहीं होगी, जिससे उनका समय बचेगा और समय पर खरीद सुनिश्चित हो सकेगी।
यह निर्णय विशेष रूप से उन बागवानों के लिए एक वरदान साबित होगा, जिनके बाग बेहद दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में स्थित हैं। नई व्यवस्था लागू होने से सी-ग्रेड सेब की खरीद प्रक्रिया अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनेगी, जिससे किसानों की लागत कम होगी और एमएसपी योजना का वास्तविक लाभ अधिक से अधिक सेब उत्पादकों तक पहुंच सकेगा।
चुनौती और उम्मीदें सरकार का मानना है कि यह कदम किसानों की आय की सुरक्षा करने के साथ-साथ हर साल होने वाली फलों की बर्बादी को रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हालांकि, जमीनी स्तर पर यह पहल कितनी कारगर साबित होती है और बागवानों के लिए कितनी हितैषी रहती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। आमतौर पर बागवानों की यह शिकायत रहती है कि सरकारी योजनाएं कागजों पर तो बेहतर होती हैं, लेकिन धरातल पर सही तरीके से लागू नहीं हो पातीं। ऐसे में इस योजना के सफल क्रियान्वयन पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।
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रतन चंद जी नमस्कार🙏 'हिमालयन डान' के नए स्वरूप को सराहने और अपनी आत्मीय शुभकामनाएं भेजने के लिए हम आपका…