“हिमाचल का निर्माण केवल सीमाओं का निर्धारण नहीं था, बल्कि एक ऐसी सोच का जन्म था जिसने पहाड़ के लोगों को आत्मविश्वास, सम्मान और विकास का नया मार्ग दिया।”
4 अगस्त 1906 को सिरमौर की धरती पर जन्मे डॉ. यशवंत सिंह परमार का जीवन इसी विचार का सशक्त उदाहरण है। वे केवल हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि उस वैचारिक आंदोलन के प्रणेता थे जिसने बिखरी हुई पहाड़ी रियासतों को एक साझा पहचान दी। आज जब हिमाचल प्रदेश अपनी स्थापना के 75 वर्ष से अधिक का सफर तय कर चुका है, तब यह समझना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस विकास यात्रा की पहली मजबूत नींव किसने रखी थी।
डॉ. परमार ने कभी सत्ता को लक्ष्य नहीं माना। उनके लिए राजनीति जनसेवा का माध्यम थी और विकास का अर्थ केवल भवनों और कार्यालयों का निर्माण नहीं, बल्कि गांवों तक शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी और सम्मानजनक जीवन पहुँचाना था।
पहाड़ को समझने वाला नेता
डॉ. परमार ने हिमालय को केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं माना। वे जानते थे कि यहां की चुनौतियां मैदानों से अलग हैं। ऊँचे-नीचे पहाड़, सीमित कृषि भूमि, कठिन परिवहन और प्राकृतिक परिस्थितियां—इन सबके बीच विकास का मॉडल भी अलग होना चाहिए।
उन्होंने पहाड़ की जरूरतों के अनुरूप योजनाओं की कल्पना की। उनका प्रसिद्ध विचार था कि “सड़कें पहाड़ों की भाग्य रेखाएं हैं।” आज प्रदेश के सबसे दूरस्थ गांव तक सड़क पहुँचाने की नीति उसी सोच का विस्तार दिखाई देती है।
बागवानी क्रांति की वैचारिक नींव
यदि आज हिमाचल का नाम देश के प्रमुख फल उत्पादक राज्यों में लिया जाता है तो इसके पीछे दशकों पहले तैयार की गई विकास दृष्टि है। डॉ. परमार ने कृषि के साथ बागवानी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाने पर जोर दिया।
उन्होंने किसानों को पारंपरिक खेती तक सीमित रखने के बजाय उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर बढ़ने का मार्ग दिखाया। सेब सहित अन्य फलों की खेती को प्रोत्साहन देने वाली नीतियों ने आगे चलकर लाखों परिवारों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जंगल केवल लकड़ी नहीं, भविष्य की पूंजी
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है। लेकिन डॉ. परमार ने कई दशक पहले ही जंगलों और पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझ लिया था।
वे लोगों से केवल पौधे लगाने की अपील नहीं करते थे, बल्कि उनकी देखभाल को भी उतना ही आवश्यक मानते थे। उनका मानना था कि वन हिमाचल की सबसे बड़ी प्राकृतिक पूंजी हैं। उन्होंने ऐसी वानिकी की कल्पना की जिसमें पर्यावरण संरक्षण के साथ ग्रामीणों की आजीविका भी मजबूत हो।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर विशेष जोर
डॉ. परमार का विश्वास था कि किसी प्रदेश की वास्तविक प्रगति उसके विद्यालयों और अस्पतालों से मापी जाती है। इसलिए उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार को विकास की प्राथमिकता बनाया।
बाद की सरकारों ने इन्हीं आधारों पर अनेक विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और स्वास्थ्य संस्थान स्थापित किए। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिमाचल की उच्च साक्षरता दर की नींव उसी दौर में रखी गई थी।
संस्कृति और लोकजीवन के संरक्षक
आधुनिक विकास के समर्थक होने के बावजूद डॉ. परमार अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़े रहे। वे हिमाचली लोक संस्कृति, वेशभूषा, भाषा, मेलों और परंपराओं को प्रदेश की पहचान मानते थे।
उनका मानना था कि विकास तभी सार्थक होगा जब वह स्थानीय संस्कृति के सम्मान के साथ आगे बढ़े। यही कारण है कि उन्होंने आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाए रखने पर बल दिया।
राजनीति में सादगी का दुर्लभ उदाहरण
आज जब राजनीति पर अक्सर निजी स्वार्थों के आरोप लगते हैं, तब डॉ. परमार का जीवन एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने निजी संपत्ति जुटाने की कोशिश नहीं की। वे सादगीपूर्ण जीवन जीते रहे। सार्वजनिक धन और पद का उपयोग केवल जनता के हित में हो—यह उनके जीवन का मूल सिद्धांत था।
उनकी ईमानदारी की चर्चा आज भी सम्मान के साथ की जाती है। उन्होंने अपने परिवार या रिश्तेदारों के लिए सत्ता का कभी उपयोग नहीं किया। यही कारण है कि विरोधी दलों के नेता भी उनके चरित्र और सार्वजनिक जीवन का सम्मान करते थे।
स्वतंत्रता आंदोलन से हिमाचल निर्माण तक
उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे न्यायिक सेवा से जुड़े, लेकिन उनका मन आम जनता की समस्याओं में अधिक रमता था। धीरे-धीरे वे प्रजामंडल आंदोलन का महत्वपूर्ण चेहरा बन गए।
उस समय पहाड़ी रियासतों में लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग जोर पकड़ रही थी। डॉ. परमार ने गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित किया और लोकतांत्रिक व्यवस्था के पक्ष में जनमत तैयार किया।
स्वतंत्रता के बाद भी उनका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। वे चाहते थे कि पहाड़ी क्षेत्रों को एक अलग प्रशासनिक पहचान मिले। इसी लक्ष्य के लिए उन्होंने राजनीतिक स्तर पर लगातार प्रयास किए।
हिमाचल को पूर्ण राज्य बनाने की ऐतिहासिक उपलब्धि
15 अप्रैल 1948 को विभिन्न पहाड़ी रियासतों के विलय से हिमाचल प्रदेश का गठन हुआ। लेकिन डॉ. परमार का सपना इससे कहीं बड़ा था। वे हिमाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाना चाहते थे।
लगातार राजनीतिक प्रयासों, संवाद और दूरदर्शी नेतृत्व के परिणामस्वरूप 25 जनवरी 1971 को हिमाचल प्रदेश पूर्ण राज्य बना। यह उपलब्धि केवल प्रशासनिक नहीं थी; यह पहाड़ के लोगों के स्वाभिमान की जीत थी।
आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार
समय बदल गया है। तकनीक बदल गई है। विकास की परिभाषाएं भी बदल रही हैं। लेकिन डॉ. परमार के मूल विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं—
- विकास प्रकृति के साथ संतुलित हो।
- गांव मजबूत होंगे तो प्रदेश मजबूत होगा।
- शिक्षा और स्वास्थ्य सर्वोच्च प्राथमिकता हों।
- राजनीति सेवा का माध्यम बने।
- स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा हर नागरिक का दायित्व हो।
यदि इन सिद्धांतों को वर्तमान विकास नीतियों में निरंतर अपनाया जाए तो हिमाचल आने वाले दशकों में भी देश के अग्रणी राज्यों में अपनी पहचान बनाए रख सकता है।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
आज की युवा पीढ़ी डॉ. परमार को केवल इतिहास की किताबों तक सीमित न रखे। उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि बड़ा परिवर्तन केवल सत्ता से नहीं, बल्कि स्पष्ट दृष्टि, ईमानदारी, धैर्य और समाज के प्रति समर्पण से आता है।
उन्होंने पहाड़ के लोगों को आत्मविश्वास दिया कि सीमित संसाधनों के बावजूद विकास संभव है। यही विश्वास आज भी हिमाचल की सबसे बड़ी ताकत है।
120वीं जयंती पर डॉ. वाई. एस. परमार को स्मरण करना केवल एक महान नेता को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस विकास दर्शन को याद करना है जिसने हिमाचल को एक विशिष्ट पहचान दिलाई।
आज जब प्रदेश नई चुनौतियों—जलवायु परिवर्तन, पलायन, प्राकृतिक आपदाओं और रोजगार—का सामना कर रहा है, तब डॉ. परमार के विचार पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं।
हिमाचल की हर सड़क, हर बाग, हर विद्यालय और हर गांव कहीं न कहीं उस दूरदर्शी व्यक्तित्व की सोच की कहानी कहता है जिसने एक सपना देखा था—एक समृद्ध, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर हिमाचल का।
— हिमालयन डॉन विशेष डेस्क







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