शिमला। हिमाचल प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए आने वाले दिन आर्थिक रूप से भारी पड़ सकते हैं। प्रदेश सरकार अब शहरों में पानी की दरों में बढ़ोतरी करने की तैयारी में है। शुक्रवार को प्रदेश सचिवालय में शहरी विकास विभाग के सचिव देवेश कुमार की अध्यक्षता में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में इस प्रस्ताव पर लंबी चर्चा की गई। बैठक के दौरान जल शक्ति विभाग के अधिकारियों ने प्रदेश में जल आपूर्ति की वर्तमान स्थिति, रखरखाव पर होने वाले भारी खर्च और बढ़ती लागत को लेकर एक विस्तृत प्रेजेंटेशन दी।
सूत्रों की मानें तो सरकार जल सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने और विभाग पर बढ़ते वित्तीय बोझ को कम करने के लिए दरों में संशोधन का मन बना चुकी है। हालांकि, इस पर अंतिम मुहर आने वाले दिनों में होने वाली मंत्रिमंडल (कैबिनेट) की बैठक में लगेगी। अगर कैबिनेट इस प्रस्ताव को हरी झंडी देती है, तो इसका सीधा असर प्रदेश के लाखों शहरी उपभोक्ताओं के मासिक बजट पर पड़ेगा।
केंद्र की ‘कड़ी शर्त’ बनी गले की फांस: इस पूरे मामले में सबसे बड़ा पेंच केंद्र सरकार की ओर से लगाई गई शर्तों का है। हाल ही में विधानसभा के बजट सत्र के दौरान उप-मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने स्पष्ट किया था कि केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन के तहत मिलने वाले शेष बजट को रोकने के पीछे ‘निशुल्क पानी’ की योजना को कारण बताया है। केंद्र का साफ कहना है कि यदि प्रदेश को मिशन का बकाया फंड (लगभग 1,227 करोड़ रुपये) चाहिए, तो उसे पानी की सप्लाई मुफ्त में देना बंद करना होगा।
केंद्र ने सुझाव दिया है कि सामान्य उपभोक्ताओं से कम से कम 100 रुपये और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से 30 रुपये प्रति माह का न्यूनतम बिल वसूला जाए। पूर्व सरकार के समय में हिमाचल के लिए करीब 6,395 करोड़ रुपये मंजूर हुए थे, लेकिन ‘मिशन पूरा होने’ की गलत रिपोर्टिंग और नई शर्तों के चलते एक बड़ी राशि अभी भी केंद्र के पास अटकी हुई है।
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पाइप खरीद और पारदर्शिता पर भी मंथन: वहीं दूसरी ओर, जल शक्ति विभाग के सचिव अभिषेक जैन की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय प्री-स्क्रीनिंग कमेटी की भी बैठक हुई। इसमें वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए विभाग को आवश्यक पाइपों और अन्य सामग्री की मांग पर चर्चा की गई। सचिव ने दोटूक निर्देश दिए कि फील्ड में होने वाले कार्यों की वास्तविक जरूरत का आकलन किया जाए और किसी भी स्तर पर पारदर्शिता और गुणवत्ता से समझौता न हो।
फिलहाल, अब सबकी नजरें आगामी कैबिनेट बैठक पर टिकी हैं, जहाँ यह तय होगा कि शहरी जनता को पानी के लिए अपनी जेब कितनी ढीली करनी होगी।
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