शिमला, 06 अप्रैल। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) हिमाचल प्रदेश ने कांगड़ा जिले के प्रसिद्ध त्रियुंड ट्रैक पर एंट्री शुल्क और कैंपिंग शुल्क लागू करने तथा इसके प्रबंधन को निजी हाथों में सौंपने के निर्णय का कड़ा विरोध किया है। परिषद ने इसे जनविरोधी और प्रदेश की प्राकृतिक धरोहरों के व्यापारीकरण की शुरुआत करार दिया है।
अभाविप की प्रदेश मंत्री नैंसी अटल ने जारी बयान में कहा कि सरकार एक ओर वन मित्रों की भर्ती के माध्यम से स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की बात करती है, जबकि दूसरी ओर प्रदेश के प्राकृतिक स्थलों को निजी ऑपरेटरों के हवाले कर रही है, जो नीति में स्पष्ट विरोधाभास को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि त्रियुंड ट्रैक पर ₹100 एंट्री शुल्क और ₹275 प्रतिदिन टेंट शुल्क लगाना आम छात्रों, युवाओं और मध्यमवर्गीय पर्यटकों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ है। हिमाचल के पहाड़, जंगल और प्राकृतिक स्थल किसी निजी संस्था की संपत्ति नहीं, बल्कि प्रदेश की जनता की साझा धरोहर हैं। ऐसे में सरकार का यह निर्णय इन धरोहरों के व्यावसायीकरण की दिशा में एक चिंताजनक कदम है।
नैंसी अटल ने आरोप लगाया कि निजीकरण के चलते पर्यावरण संरक्षण के बजाय मुनाफाखोरी को प्राथमिकता मिलेगी, जिससे त्रियुंड जैसे संवेदनशील क्षेत्र में अति-पर्यटन, कचरा प्रबंधन की समस्या और प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि एंट्री समय को सीमित करना और नियंत्रण बढ़ाना युवाओं की प्राकृतिक स्थलों तक सहज पहुंच को बाधित करता है।
अभाविप ने सरकार से मांग की है कि इस निर्णय को तुरंत वापस लिया जाए और त्रियुंड ट्रैक का प्रबंधन पुनः सरकारी स्तर पर रखा जाए। साथ ही, स्थानीय युवाओं और वन मित्रों को प्राथमिकता देते हुए पारदर्शी और जनहितैषी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। परिषद ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने यह निर्णय वापस नहीं लिया तो प्रदेशभर में इसके खिलाफ आंदोलन किया जाएगा।
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