Himalayan Dawn | सोलन। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व कृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। हिमाचल प्रदेश सहित पूरे देश में श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करेंगे और रात को उनके जन्मोत्सव का आयोजन किया जाएगा।
जन्माष्टमी को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। मंदिरों और घरों में लड्डू गोपाल का श्रृंगार, झांकियां, झूले और विशेष पूजा की तैयारियां की जा रही हैं। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का सबसे महत्वपूर्ण समय निशिता काल, यानी मध्यरात्रि के आसपास का समय माना जाता है।
हिमाचल प्रदेश में कब है जन्माष्टमी?
पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में कृष्ण जन्माष्टमी का मुख्य पर्व 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। हालांकि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की विशेष पूजा मध्यरात्रि में होने के कारण पूजा का समय 4 सितंबर की रात से 5 सितंबर की शुरुआती घड़ियों तक रहेगा।
हिमाचल प्रदेश में रात की पूजा का शुभ मुहूर्त
हिमाचल प्रदेश के विभिन्न शहरों में स्थानीय सूर्योदय और भौगोलिक स्थिति के अनुसार पूजा के समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है।
पंचांग के अनुसार:
जन्माष्टमी: शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
निशिता पूजा: रात 12:01 बजे से 12:46 बजे तक, 5 सितंबर
पूजा की अवधि: लगभग 45 मिनट
पारण (धर्मशास्त्रीय परंपरा के अनुसार): सुबह 6:02 बजे के बाद, 5 सितंबर
आधुनिक परंपरा के अनुसार पारण: निशिता पूजा के बाद किया जा सकता है।
हिमाचल प्रदेश के शिमला, सोलन, मंडी, कुल्लू, सिरमौर और अन्य क्षेत्रों में स्थानीय समय में मामूली अंतर संभव है। इसलिए श्रद्धालु अपने क्षेत्र के मंदिर या स्थानीय पंचांग से भी समय की पुष्टि कर सकते हैं।
अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र
वर्ष 2026 में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर की सुबह शुरू होकर 5 सितंबर की मध्यरात्रि के आसपास समाप्त होगी। वहीं रोहिणी नक्षत्र भी 4 सितंबर को प्रभावी रहेगा। इसी कारण अधिकांश स्थानों पर जन्माष्टमी का व्रत और मुख्य पर्व 4 सितंबर को मनाया जाएगा।
जन्माष्टमी पर ऐसे करें भगवान श्रीकृष्ण की पूजा
जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु सुबह स्नान कर व्रत और पूजा का संकल्प लेते हैं। घर के पूजा स्थल को साफ कर भगवान श्रीकृष्ण या लड्डू गोपाल की प्रतिमा स्थापित की जाती है।
पूजा के दौरान श्रद्धालु—
- लड्डू गोपाल को स्नान कराते हैं।
- नए और सुंदर वस्त्र पहनाते हैं।
- फूलों से श्रृंगार करते हैं।
- झूला सजाते हैं।
- माखन-मिश्री, फल और मिठाई का भोग लगाते हैं।
- भगवान को मोर पंख और बांसुरी अर्पित करते हैं।
- भजन और कीर्तन करते हैं।
- मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाकर आरती करते हैं।
रात 12 बजे क्यों मनाया जाता है कृष्ण जन्मोत्सव?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में हुआ था। इसलिए जन्माष्टमी की रात निशिता काल में विशेष पूजा की जाती है और भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है।
मध्यरात्रि में श्रद्धालु शंख और घंटियां बजाकर “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयकारे लगाते हैं। इसके बाद लड्डू गोपाल का अभिषेक, श्रृंगार और आरती की जाती है।
व्रत में क्या रखें ध्यान?
जन्माष्टमी का व्रत हर परिवार अपनी धार्मिक परंपरा और स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार रखता है। कई श्रद्धालु फलाहार करते हैं, जबकि कुछ लोग निर्जल या अन्य प्रकार का व्रत रखते हैं।
व्रत के दौरान पूजा, भजन और भगवान श्रीकृष्ण के स्मरण को विशेष महत्व दिया जाता है। बच्चों, बुजुर्गों और स्वास्थ्य संबंधी समस्या वाले लोगों को अपनी स्थिति के अनुसार व्रत रखना चाहिए।
एक नजर में जन्माष्टमी 2026
तारीख: 4 सितंबर 2026, शुक्रवार
मुख्य पर्व: कृष्ण जन्माष्टमी
विशेष पूजा: निशिता काल में मध्यरात्रि के आसपास
धर्मशाला क्षेत्र का निशिता पूजा समय: रात 12:01 बजे से 12:46 बजे तक, 5 सितंबर
मुख्य आयोजन: व्रत, लड्डू गोपाल का श्रृंगार, झूला, भोग, भजन-कीर्तन और मध्यरात्रि आरती।













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