हिमालयन डॉन, शिमला: हिमाचल प्रदेश में आगामी पंचायती राज चुनावों की घोषणा से ठीक पहले राज्य सरकार ने चुनावी नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए दो बड़े संशोधन किए हैं। इन संशोधनों का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को स्पष्ट और व्यवहारिक बनाना बताया जा रहा है। सरकार द्वारा मंजूर किए गए इन प्रस्तावों को अब अंतिम कानूनी जांच (लीगल स्क्रूटनी) के लिए विधि विभाग को भेज दिया गया है।
वन भूमि मामलों में उम्मीदवारों को राहत
पहला संशोधन उन लोगों से जुड़ा है जिन पर वन भूमि पर कब्जे के मामले दर्ज हैं। नए प्रावधान के तहत यदि किसी व्यक्ति या परिवार का मामला वन अधिकार समिति के पास लंबित है, तो वह चुनाव लड़ने के लिए पात्र माना जाएगा।
प्रदेश में बड़ी संख्या में ऐसे मामले हैं, जहां लोग दशकों से वन भूमि पर रह रहे हैं। यदि कोई परिवार लगभग तीन पीढ़ियों (करीब 75 वर्ष) से ऐसी भूमि पर काबिज है और उसने इसे नियमित करने के लिए आवेदन किया हुआ है, तो उसे इस संशोधन के तहत राहत मिलेगी। सरकार का मानना है कि इससे हजारों लोगों को चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिलेगा।
जिला परिषद और बीडीसी चुनाव प्रक्रिया में बदलाव
दूसरा संशोधन जिला परिषद और ब्लॉक विकास समिति (BDC) के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव से संबंधित है। इसमें कोरम और बैठक की समयसीमा में बदलाव प्रस्तावित किया गया है।
जिला परिषद की दूसरी बैठक के लिए निर्धारित 10 दिन की अवधि को घटाकर 7 दिन किया जा रहा है।
इससे चुनाव प्रक्रिया को तेज और अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया गया है।
हालांकि, इन बदलावों का अंतिम स्वरूप तभी स्पष्ट होगा जब संशोधन का ड्राफ्ट आधिकारिक रूप से अधिसूचित किया जाएगा।
चिट्टा तस्करी से जुड़े आरोपियों पर सख्ती
राज्य सरकार ने पंचायती राज एक्ट में एक और संशोधन करते हुए नशा तस्करी (चिट्टा मामलों) में संलिप्त व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोकने का प्रावधान भी जोड़ा है। यह संशोधन राज्यपाल की मंजूरी के बाद लागू होगा और संभावना है कि आगामी चुनावों में ही इसे लागू कर दिया जाए।
परिवार की परिभाषा में बदलाव, अब बहू भी शामिल
सरकार ने चुनावी पात्रता से जुड़े एक पुराने नियम को और सख्त किया है। अब यदि किसी परिवार के सदस्य—चाहे वह सास-ससुर ही क्यों न हों—सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के दोषी पाए जाते हैं, तो बहू भी चुनाव नहीं लड़ सकेगी।
पहले कई मामलों में परिवार बहू को उम्मीदवार बनाकर नियमों का फायदा उठा लेते थे, लेकिन अब इस loophole को बंद कर दिया गया है।
पंचायती राज चुनाव 2026 से पहले किए गए ये संशोधन चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सख्त और व्यावहारिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं। जहां एक ओर पात्रता में कुछ राहत दी गई है, वहीं दूसरी ओर नियमों को सख्ती से लागू करने का संकेत भी स्पष्ट है।
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