जनजातीय अधिकारों और न्याय पर HPNLU शिमला में राष्ट्रीय मंथन, सरकार और विश्वविद्यालय के बीच हुआ अहम समझौता

On: March 29, 2026 10:09 AM
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शिमला | हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (HPNLU), शिमला ने समकालीन भारत में जनजातीय समुदायों की पहचान और उनके अधिकारों की चुनौतियों पर एक महत्वपूर्ण संवाद की मेजबानी की। विश्वविद्यालय के ‘जनजातीय और सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र’ द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन का विषय “पहचान, अधिकार और वास्तविकताएँ: समकालीन भारत में जनजातीय पहचान, शासन और न्याय” रहा।

​कुलपति प्रो. (डॉ.) प्रीती सक्सेना के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम में देश-विदेश के शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं ने जनजातीय समाज के संवैधानिक व सामाजिक पहलुओं पर गहन चर्चा की।

​मुख्य बातें: समावेशी शासन और ₹7 लाख की घोषणा

​उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित सांसद सुरेश कुमार कश्यप ने आदिवासी समुदायों की अद्वितीय सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को सहेजने पर ज़ोर दिया। उन्होंने विश्वविद्यालय की इस पहल की सराहना करते हुए डिकंपोज़र (Decomposer) के लिए ₹7 लाख के योगदान की घोषणा भी की। मुख्य वक्ता प्रो. (डॉ.) हरीश ठाकुर ने विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्र के जनजातीय ढांचों पर अपने विचार साझा किए।

​सरकार और HPNLU के बीच ऐतिहासिक समझौता (MoU)

​सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव हिमाचल प्रदेश सरकार के जनजातीय विकास मंत्रालय और HPNLU शिमला के बीच हुआ समझौता ज्ञापन (MoU) रहा। इसके तहत अब सरकार और विश्वविद्यालय मिलकर:

  • ​जनजातीय कल्याण के लिए शोध (Research) और फंडिंग पर काम करेंगे।
  • ​क्षमता निर्माण और ज़मीनी स्तर की पहलों में सहयोग करेंगे।
  • ​सतत विकास के लिए अकादमिक साझेदारी को बढ़ावा देंगे।

​नीति और हकीकत के बीच की खाई को पाटने का प्रयास

​समापन सत्र में प्रदेश के जनजातीय विकास मंत्री जगत सिंह नेगी ने शिरकत की। उन्होंने राज्य सरकार की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि नीतियों को प्रभावी बनाने में शैक्षणिक संस्थानों का सहयोग अनिवार्य है। वहीं, प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्तामानशी आशेर ने ‘जल, जंगल और ज़मीन’ के अधिकारों के साथ-साथ हिमालयी क्षेत्र में समुदाय-आधारित विकास पर ज़ोर दिया।

​”अकादमिक संस्थानों की भूमिका केवल थ्योरी तक सीमित नहीं है, बल्कि शोध के ज़रिए नीतियों और ज़मीनी हकीकतों के बीच की खाई को पाटना हमारा मुख्य लक्ष्य है।”

— प्रो. (डॉ.) एस. एस. जसवाल, फैकल्टी डायरेक्टर (जनजातीय केंद्र)

​सम्मेलन के अंत में रजिस्ट्रार प्रो. (डॉ.) आलोक कुमार ने सभी प्रतिभागियों और सहयोगियों का धन्यवाद किया। पाँच तकनीकी सत्रों में हुए इस मंथन ने यह स्पष्ट कर दिया कि जनजातीय न्याय के लिए ‘अधिकार-आधारित दृष्टिकोण’ ही भविष्य की राह है।

​ब्यूरो रिपोर्ट: हिमालयन डॉन, शिमला।

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Akshay Chauhan

अक्षय चौहान पिछले 12 वर्षों से पत्रकारिता एवं मीडिया प्रबंधन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वे साप्ताहिक हिमालयन डॉन के संपादकीय एवं प्रबंधन कार्यों का सफलतापूर्वक नेतृत्व कर रहे हैं। समाचार संकलन, संपादन, डिजिटल मीडिया, कंटेंट प्रबंधन तथा समाचार पत्र के संचालन में उनका व्यापक अनुभव रहा है।

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