वोटर लिस्ट नोटिफाई न होने से चुनावी प्रक्रिया अटकी
शिमला। हिमाचल प्रदेश में पंचायत और नगर निकाय चुनावों को लेकर अनिश्चितता और गहराती जा रही है। हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद राज्य में चुनावी प्रक्रिया ज़मीन पर आगे बढ़ती नहीं दिख रही है। मुख्य वजह अब तक कई जिलों में वोटर लिस्ट का नोटिफिकेशन न होना है।
हाईकोर्ट के आदेशों का पालन नहीं
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग और सरकार को निर्देश दिए थे कि पंचायत व नगर निकाय चुनाव 30 अप्रैल से पहले कराए जाएं। इसके तहत राज्य चुनाव आयोग ने सभी जिलों के उपायुक्त (DC) और उपमंडलाधिकारियों (SDM) को 30 जनवरी तक वोटर लिस्ट नोटिफाई करने के आदेश दिए थे। लेकिन अब तक 9 जिलों के DC और लगभग 45 SDM ने वोटर लिस्ट नोटिफाई नहीं की है। इससे राज्य चुनाव आयोग वोटर लिस्ट की प्रिंटिंग तक शुरू नहीं कर पा रहा है।
केवल 3 जिलों में हुआ फॉर्म-15 नोटिफिकेशन
राज्य चुनाव आयोग के अनुसार अब तक केवल चंबा, शिमला और लाहौल-स्पीति जिलों के DC ने पंचायत चुनाव की वोटर लिस्ट के साथ फॉर्म-15 नोटिफाई किया है।
नगर निकाय चुनाव के लिए SDM द्वारा फॉर्म-17 नोटिफाई किया जाना होता है, लेकिन लगभग 20 SDM ने ही अब तक नगर निकायों की वोटर लिस्ट जारी की है।
प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल
अधिकांश जिलों में DC-SDM द्वारा न तो हाईकोर्ट और न ही राज्य चुनाव आयोग के आदेशों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है। इससे चुनावी प्रक्रिया में देरी हो रही है और राज्य सरकार की मंशा पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सरकार सुप्रीम कोर्ट जा सकती है?
सूत्रों के अनुसार राज्य सरकार हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में SLP (स्पेशल लीव पिटिशन) के माध्यम से चुनौती देने पर विचार कर रही है। सरकार सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क दे सकती है कि पंचायत चुनाव राज्य के पंचायत राज अधिनियम के तहत आते हैं, जबकि डिजास्टर एक्ट संसद द्वारा बनाया गया कानून है।
मानसून बना सकता है और मुश्किल
यदि मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है और अप्रैल में चुनाव नहीं हो पाते, तो 25 मई के बाद प्री-मानसून शुरू होने की संभावना है। मानसून के दौरान चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं होगा। इसके अलावा अगस्त में राज्य चुनाव आयुक्त अनिल खाची के सेवानिवृत्त होने के बाद नए आयुक्त की नियुक्ति तक भी चुनाव टल सकते हैं।
3577 पंचायतों और 73 निकायों में होने हैं चुनाव
प्रदेश में कुल 3577 पंचायतों और 73 नगर निकायों में चुनाव होने हैं।
पंचायतों का कार्यकाल 31 जनवरी 2026 और 47 नगर निकायों का कार्यकाल 18 जनवरी 2026 को समाप्त हो चुका है। फिलहाल इन संस्थाओं में एडमिनिस्ट्रेटर तैनात हैं, जिसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं माना जा रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक निर्वाचित प्रतिनिधियों के स्थान पर एडमिनिस्ट्रेटर बने रहना स्थानीय स्वशासन को कमजोर करता है और जनता की भागीदारी भी प्रभावित होती है।
आरक्षण रोस्टर भी बना चुनौती
हाईकोर्ट ने 28 फरवरी तक सभी पंचायतों और नगर निकायों में आरक्षण रोस्टर लागू करने के आदेश दिए हैं। तय समय तक रोस्टर लागू नहीं होने पर कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट की स्थिति बन सकती है।
सरकार सुप्रीम कोर्ट में SLP दायर कर इस आधार पर हाईकोर्ट में अवमानना से बचने का तर्क भी रख सकती है।
मंत्री का पक्ष: पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट जाने पर अभी कोई अंतिम मुहर नहीं लगी है, लेकिन सरकार सभी कानूनी पहलुओं पर विचार कर रही है।
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