सिरमौर के गिरिपार में नेवदा रस्म बंद करने के लिए महासू मंदिर में एकत्रित ग्रामीण।

सिरमौर के गिरिपार में आधुनिकता की नई बयार, 200 साल पुरानी ‘नेवदा’ रस्म पर लगा विराम

Sirmour

शिलाई (सिरमौर): हिमाचल प्रदेश का गिरिपार (ट्रांसगिरी) क्षेत्र, जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और अनूठी परंपराओं के लिए जाना जाता है, अब सामाजिक सुधार की एक नई मिसाल पेश कर रहा है। समय की मांग और बढ़ती महंगाई को देखते हुए, जिला सिरमौर की गवाली पंचायत के पशमी और घासन गांव के ग्रामीणों ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए 200 साल पुरानी ‘नेवदा’ रस्म को पूरी तरह से बंद कर दिया है।

आराध्य देव की कसम खाकर लिया सामूहिक संकल्प

​रविवार को ढिमेदार बारू राम चौहान के नेतृत्व में पशमी और घासन गांव के ग्रामीण स्थानीय महासू मंदिर में एकत्रित हुए। यहाँ ग्रामीणों ने अपने आराध्य देव की सौगंध खाकर इस कुरीति को त्यागने का संकल्प लिया। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि जो भी परिवार इस सामाजिक नियम का उल्लंघन करेगा, उसका न केवल ‘हुक्का-पानी’ बंद किया जाएगा, बल्कि उस पर भारी आर्थिक दंड भी लगाया जाएगा। पूरे क्षेत्र में मुनादी करवाकर ग्रामीणों को इस नए नियम से अवगत करा दिया गया है।

शादियों में होंगे ये क्रांतिकारी बदलाव:

​ग्रामीणों ने शादियों में होने वाले समय और धन के अपव्यय को रोकने के लिए कई कड़े नियम बनाए हैं:

  • एक दिन का समारोह: जो शादियां पहले एक सप्ताह तक चलती थीं, वे अब केवल एक दिन के रिसेप्शन तक सीमित रहेंगी।
  • बारात की सीमा: अब बारात में अधिकतम 10 गाड़ियां और केवल 50 बराती ही शामिल हो सकेंगे।
  • नेवदा की जगह शगुन: पहले शादी में 5 रुपये का ‘नेवदा’ अनिवार्य था, जिसे अब समाप्त कर ऐच्छिक शगुन की व्यवस्था शुरू की गई है।
  • दहेज और दिखावे पर रोक: शादी में सोने-चांदी के गहनों के प्रदर्शन पर अंकुश लगाया गया है और दहेज के लेन-देन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
  • भोज में कटौती: शादी से पहले लकड़ी काटने की ‘धाम’ और कामगारों (रोटियारी) को दिया जाने वाला अलग से ‘बकरा भोज’ अब नहीं होगा। हालांकि, मामा के स्वागत में होने वाला पारंपरिक बकरा भोज पूर्ववत जारी रहेगा।

क्यों लिया गया यह फैसला?

​बैठक में उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों—खजान सिंह चौहान, नरेंद्र चौहान, प्रकाश चौहान और नरेश चौहान—ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और बेतहाशा महंगाई के दौर में पुरानी खर्चीली रस्मों को निभाना आम आदमी के लिए कठिन होता जा रहा था। समाज के गरीब तबके पर इसका आर्थिक बोझ बढ़ रहा था, जिसे कम करने के लिए यह साहसिक कदम उठाया गया है।

“परंपराएं समाज को जोड़ने के लिए होती हैं, बोझ बनने के लिए नहीं। गवाली पंचायत का यह फैसला आने वाली पीढ़ी के लिए एक समृद्ध और फिजूलखर्ची मुक्त भविष्य का मार्ग प्रशस्त करेगा।”

— बारू राम चौहान, ढिमेदार

बदलाव की ओर बढ़ता गिरिपार

​गौरतलब है कि पशमी और घासन गांव से पहले कांडो च्योग पंचायत ने भी इस दिशा में पहल की थी। गिरिपार क्षेत्र में एक के बाद एक पंचायतों द्वारा लिए जा रहे ये फैसले इस बात का प्रमाण हैं कि यह क्षेत्र अब रूढ़िवादिता को पीछे छोड़कर आधुनिकता और प्रगतिशील सोच की ओर कदम बढ़ा रहा है।

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