शिमला: भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली का ऐतिहासिक ‘कर्तव्य पथ’ एक बार फिर देश की विविध संस्कृतियों और सैन्य शक्ति का गवाह बना। इस वर्ष रक्षा मंत्रालय द्वारा चयनित 17 राज्यों की झांकियों में हिमाचल प्रदेश की झांकी आकर्षण का केंद्र रही। हिमाचल प्रदेश ने अपनी इस प्रस्तुति के माध्यम से दुनिया को यह संदेश दिया कि यह राज्य केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और देवी-देवताओं के आशीर्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वह मिट्टी है जिसने देश की रक्षा के लिए अपने सर्वश्रेष्ठ सपूतों का बलिदान दिया है।
देवभूमि की आध्यात्मिकता और वीरभूमि का शौर्य
हिमाचल प्रदेश को सदियों से ‘देवभूमि’ के रूप में पूजा जाता रहा है। यहाँ के कण-कण में देवताओं का वास माना जाता है। लेकिन इस वर्ष की झांकी ने एक नया आयाम प्रस्तुत किया— ‘वीरभूमि’। झांकी के अग्रभाग में जहाँ राज्य की आध्यात्मिक शांति और पवित्रता के दर्शन हुए, वहीं मध्य और पिछले हिस्से में हिमाचल के उन जांबाज योद्धाओं की वीरता को दर्शाया गया, जिन्होंने दुर्गम पहाड़ियों की चोटियों से लेकर रेगिस्तान की तपती रेत तक तिरंगे की आन-बान और शान को बरकरार रखा।
वीरता के आंकड़ों में हिमाचल का दबदबा
हिमाचल प्रदेश का सैन्य इतिहास केवल कहानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रमाण वीरता पुरस्कारों के रूप में दर्ज हैं। झांकी के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि एक छोटा राज्य होने के बावजूद, हिमाचल ने भारतीय सेना को 1,203 वीरता पुरस्कार दिए हैं। यह संख्या राज्य की जनसंख्या के अनुपात में भारत के सैन्य इतिहास में असाधारण मानी जाती है।
हिमाचल के नाम दर्ज प्रमुख सम्मान:
- परमवीर चक्र: 4 (भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान)
- अशोक चक्र: 2
- महावीर चक्र: 10
इन आंकड़ों ने दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कैसे पहाड़ों की शांत वादियों में पला-बढ़ा एक युवा, सीमाओं पर देश का सबसे मजबूत कवच बन जाता है।
पहाड़ों की सहनशक्ति और बलिदान की प्रेरणा
झांकी की थीम ‘पहाड़ों की सहनशक्ति’ पर आधारित थी। जिस तरह हिमालय अडिग खड़ा रहकर तूफानों का सामना करता है, ठीक उसी प्रकार हिमाचल के बेटे-बेटियों ने देश की पुकार पर अपना सर्वस्व न्योछावर किया है। झांकी में उन गुमनाम नायकों और वीर नारियों को भी श्रद्धांजलि दी गई, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर राष्ट्र निर्माण और सुरक्षा में योगदान दिया। यह प्रस्तुति केवल एक प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि उन परिवारों के प्रति सम्मान था जिन्होंने अपने जिगर के टुकड़ों को भारत माता की सेवा में समर्पित कर दिया।
सांस्कृतिक समृद्धि और सैन्य परंपरा का संगम
हिमाचल की झांकी ने केवल युद्ध कौशल ही नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को भी खूबसूरती से पिरोया था। झांकी के साथ चल रहे कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा में कुल्लू नाटी और अन्य लोक नृत्यों की झलक पेश की, जो राज्य की जीवंतता को दर्शाती है। चंबा रूमाल, कांगड़ा पेंटिंग और किन्नौरी शिल्प जैसी कलाकृतियों के संकेतों ने यह स्पष्ट किया कि यहाँ की वीरता, यहाँ के संस्कारों और लोकगीतों में रची-बसी है।
एक विरासत जो आज भी जीवित है
हिमाचल प्रदेश की यह विरासत अतीत के पन्नों तक सीमित नहीं है। आज भी भारतीय सेना की ‘डोगरा रेजिमेंट’ और अन्य इकाइयों में हिमाचल के युवाओं का बड़ा प्रतिनिधित्व है। झांकी ने यह संदेश दिया कि ‘देवभूमि’ का आशीर्वाद ही है जो यहाँ के लोगों के चरित्र में साहस और निडरता भरता है।
कर्तव्य पथ पर निकली हिमाचल की झांकी ने यह सिद्ध कर दिया कि शांति और शौर्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहाँ एक ओर देवों की स्तुति होती है, वहीं दूसरी ओर सीमाओं की रक्षा के लिए हुंकार भरी जाती है। यह झांकी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी कि कैसे अपनी जड़ों से जुड़े रहकर देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया जाता है।
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