कृषि विज्ञान केंद्र धौलाकुआं द्वारा विकसित हस्क-लेस जौ की नई किस्म

कृषि विज्ञान केंद्र धौलाकुआं ने विकसित की नई ‘हस्क-लेस’ जौ किस्म, प्रोसेसिंग होगी आसान, बाजार में बढ़ेगी मांग

Sirmour

धौलाकुआं (हिमालयन डॉन): हिमाचल प्रदेश में किसानों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने और खेती को आधुनिक व लाभकारी बनाने की दिशा में एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। सिरमौर जिले के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), धौलाकुआं के वैज्ञानिकों ने जौ की एक ऐसी अनूठी किस्म विकसित की है, जो छिलका-रहित (हस्क-लेस) है। यह नई खोज न केवल खेती की लागत कम करेगी, बल्कि बाजार में जौ की मांग और किसानों के मुनाफे को भी नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी।

क्या है इस नई किस्म की खासियत?

​पारंपरिक जौ के दानों पर एक सख्त छिलका होता है, जिसे हटाने के लिए जटिल और महंगी प्रोसेसिंग की आवश्यकता होती है। लेकिन धौलाकुआं केंद्र द्वारा विकसित इस नई किस्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें छिलका नहीं होता।

  • आसान प्रोसेसिंग: किसान इसे गेहूं की तरह ही आसानी से सीधे प्रोसेस और उपयोग कर सकेंगे।
  • समय और धन की बचत: छिलका हटाने की मशीनरी और अतिरिक्त श्रम की जरूरत नहीं पड़ने से किसानों का खर्च घटेगा।
  • उच्च गुणवत्ता: वैज्ञानिकों के अनुसार, यह किस्म पोषण और गुणवत्ता के मामले में पारंपरिक जौ से कहीं बेहतर है।

दो साल की मेहनत लाई रंग

​कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक पिछले दो वर्षों से इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। परीक्षणों के दौर से गुजरने के बाद, अब इसका सफल उत्पादन केंद्र के प्रदर्शनी फार्म में कर लिया गया है। फसल की पैदावार और गुणवत्ता को देखते हुए वैज्ञानिक बेहद उत्साहित हैं।

वैज्ञानिकों का नज़रिया

​केंद्र के प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने बताया कि:

“हस्क-लेस जौ किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है। इसकी सरल प्रोसेसिंग और बढ़ती बाजार मांग को देखते हुए, किसानों को इसके बहुत अच्छे दाम मिलने की उम्मीद है। जल्द ही इस नई किस्म के बीज आम किसानों को उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि वे इसे व्यावसायिक स्तर पर उगा सकें।”

भविष्य की राह: व्यावसायिक खेती को मिलेगा बढ़ावा

​कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती वैश्विक मांग और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण ‘हस्क-लेस’ जौ की मांग तेजी से बढ़ रही है। हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में इस तरह की उन्नत किस्में किसानों को पारंपरिक खेती के बजाय व्यावसायिक खेती की ओर प्रेरित करेंगी। यह किस्म न केवल उत्पादन लागत को कम करेगी, बल्कि बाजार में भी हिमाचल के किसानों को अन्य प्रदेशों के मुकाबले बढ़त दिलाएगी।


बिना छिलके वाली जौ की यह नई किस्म हिमाचल के कृषि क्षेत्र में एक नई क्रांति ला सकती है। यदि यह तकनीक प्रदेश के हर किसान तक पहुँचती है, तो यह निश्चित रूप से ग्रामीण आय बढ़ाने और कृषि को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी।

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