हिमाचल में 20 बीघा तक सरकारी-वन भूमि का कब्जा हो सकता है नियमित! सरकार लाई नई पॉलिसी, कैबिनेट में जल्द होगा फैसला

On: June 5, 2026 5:27 AM
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हिमाचल प्रदेश में सरकारी और वन भूमि नियमितीकरण नीति पर बैठक करते मंत्री एवं अधिकारी।
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सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद तैयार हुआ नीति मसौदा, लघु एवं सीमांत किसानों और भूमिहीन परिवारों को मिल सकती है बड़ी राहत

हिमालयन डॉन संवाददाता, शिमला, 05 जून, 2026। हिमाचल प्रदेश के हजारों लघु एवं सीमांत किसानों तथा भूमिहीन परिवारों के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। राज्य सरकार सरकारी और वन भूमि पर वर्षों से काबिज पात्र लोगों के कब्जों को नियमित करने के लिए नई नीति लेकर आ रही है। इस नीति के तहत अधिकतम 20 बीघा तक भूमि नियमित किए जाने का प्रावधान रखा गया है।

राजस्व विभाग ने नीति का प्रारूप तैयार कर विधि विभाग को भेज दिया है। गुरुवार को राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी की अध्यक्षता में आयोजित मंत्रिमंडलीय उप-समिति की बैठक में इस मसौदे पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक में शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर सहित वरिष्ठ प्रशासनिक और वन विभाग के अधिकारी भी उपस्थित रहे।

बैठक में अधिकारियों ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप लघु एवं सीमांत किसानों तथा भूमिहीन लोगों के भूमि कब्जों को नियमित करने के लिए नीति तैयार कर ली गई है। अब इस नीति को राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जाएगा।

कैबिनेट से स्वीकृति मिलने के बाद नीति को केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट को भी नई नीति से अवगत करवाया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बनी नीति

गौरतलब है कि वर्ष 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में सरकारी और वन भूमि पर अतिक्रमण से जुड़े मामलों में अहम फैसला सुनाया था। अदालत ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया था, जिनमें कथित अतिक्रमित वन भूमि पर लगे सेब और अन्य फलदार पेड़ों को हटाने के निर्देश दिए गए थे।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि ऐसे मामलों में नीति बनाने और निर्णय लेने का अधिकार राज्य सरकार के पास है। अदालत ने यह भी कहा था कि व्यापक न्यायिक निर्देशों के दूरगामी और गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को सलाह दी थी कि वह एक ऐसी नीति बनाए जिसमें निजी भूमि मालिकों द्वारा किए गए अतिक्रमण और वास्तव में भूमिहीन एवं जरूरतमंद लोगों के मामलों में स्पष्ट अंतर किया जाए।

सेब बागानों को लेकर भी होगा फैसला

अदालत ने यह भी माना था कि जिन क्षेत्रों में सेब या अन्य फलदार वृक्षों के स्वस्थ बागान विकसित हो चुके हैं, उनके नियमितीकरण अथवा आबंटन का निर्णय सरकार को नीति के माध्यम से करना चाहिए। इसी आधार पर राज्य सरकार ने नई नीति का मसौदा तैयार किया है।

वन संरक्षण अधिनियम बन सकता है चुनौती

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस नीति के क्रियान्वयन में वन संरक्षण अधिनियम (एफसीए) सबसे बड़ी कानूनी चुनौती बन सकता है। क्योंकि वन भूमि से जुड़े किसी भी निर्णय के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक होगी।

अब सभी की नजरें राज्य मंत्रिमंडल की आगामी बैठक पर टिकी हैं। यदि कैबिनेट इस नीति को मंजूरी देती है और केंद्र सरकार से भी स्वीकृति मिल जाती है, तो प्रदेश के हजारों भूमिहीन परिवारों और छोटे किसानों को बड़ी राहत मिल सकती है।


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