दिल्ली। दिसंबर की इस सुबह, जब दिल्ली की धुंध सड़कों, स्ट्रीटलाइट्स और दिखने वाली हर चीज़ को निगलने लगती है, और गाड़ियां और दूसरे वाहन गुरुग्राम हाईवे पर एक धातु के सांप की तरह रेंगते हैं, तो दूर अरावली पहाड़ियों की पुरानी आकृतियाँ उभरती हैं।
कोई बर्फ से ढकी चोटियाँ नहीं, कोई पोस्टकार्ड जैसी खूबसूरत नज़ारे नहीं; बस घिसी-पिटी, टूटी-फूटी पहाड़ियाँ, जैसे धरती ने अपनी सबसे पुरानी पांडुलिपि पत्थर पर लिख दी हो।
अरावली में ऐसी “पोस्टकार्ड जैसी चोटियाँ” कम हैं, यानी वे बहुत ऊंची नहीं दिखतीं; लेकिन उनका काम बहुत बड़ा है। वे धूल भरी आंधियों को रोकती हैं, ज़मीन के पानी को रिचार्ज करती हैं, बायोडायवर्सिटी की रक्षा करती हैं, और अपनी गोद में वन्यजीवों का पालन-पोषण करती हैं।
यह अरावली रेंज है, उत्तर-पश्चिमी भारत की पर्वत श्रृंखला, जिसे वैज्ञानिक साहित्य और आम भूगोल दोनों में “भारत की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखला” के रूप में पहचाना जाता है।
भारत की रीढ़
अरावली भारत की रीढ़ है, जो चार राज्यों से गुजरती है. यह उत्तर-पश्चिम भारत में लगभग 670 किलोमीटर लंबी मानी जाती है.
यह दिल्ली के पास से शुरू होकर दक्षिण हरियाणा और राजस्थान के भीतर गहराई तक जाती है, और फिर गुजरात में अहमदाबाद के आसपास के मैदानों तक पहुंचती है.
उत्तर भारत की ग्रीन वॉल
अरावली को उत्तर भारत की ‘ग्रीन वॉल’ कहा जाता है. थार मरुस्थल के विस्तार को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकने वाली प्राकृतिक दीवार. वनस्पति, मिट्टी, ढलानों और जल-धारण क्षमता का सम्मिलित तंत्र है.
नागरिक समूहों और कुछ तकनीकी आकलनों में अरावली के भीतर कई ‘गैप्स-ब्रीच’ का उल्लेख मिलता है. ऐसे हिस्से जहां पहाड़ियों की निरंतरता टूट गई है, और धूल-रेत के लिए रास्ता खुला है.
इस फ्रेम में दिल्ली-एनसीआर की धूल-आंधियाँ केवल मौसमी घटना नहीं, भूगोल का संकेत बन जाती हैं: इस पर्वतमाला में छेद बढ़ रहे हैं.
यह एक कठिन कहानी है, क्योंकि यहां कारण ‘एक’ नहीं हैं. कहीं अवैध खनन है, कहीं वैध खनन का विस्तार, कहीं अनियोजित शहरीकरण, कहीं सड़क-रेल जैसी रैखिक परियोजनाएं, जो परिदृश्य को काटकर ‘टुकड़ों’ में बदल देती हैं.
दिल्ली के भीतर ‘रिज’, जिसे अरावली की उत्तरी कड़ी के रूप में देखा जाता है, शहरी पारिस्थितिकी का वह हिस्सा है, जिसे लोग पार्क की तरह देखते हैं, लेकिन वह मूलतः एक भू-रक्षात्मक संरचना है. यह धूल रोकने, सूक्ष्म जलवायु बनाने और जैव विविधता को टिकाए रखने वाला सुरक्षा तंत्र है.
अरावली दूर से ‘बंजर’ लगती है; लेकिन यही वन्यजीवों का भी घर है. तेंदुआ, धारीदार लकड़बग्घा, सियार, नीलगाय, साही और अनेक पक्षी प्रजातियां इसमें निवास करती हैं.
हरियाणा–दिल्ली–राजस्थान के किनारों पर तेंदुए की उपस्थिति की ख़बरें बार-बार आती रही हैं, और वन्यजीव कॉरिडोर की चर्चा भी.
इस कॉरिडोर का सवाल केवल ‘जानवर बचाओ’ नहीं है; यह परिदृश्य की अखंडता का सवाल है.
जब पहाड़ों के बीच सड़कें और रियल-एस्टेट ‘कट-लाइन’ बनाते हैं तो आवास छोटे द्वीपों में बंट जाता है.
छोटे द्वीपों में बड़े शिकारी टिकते नहीं और फिर मानव–वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है और अंततः ‘वन्यजीव तो रहे नहीं’ का बहाना बनाकर विकास के बहाने विनाश आ बैठता है.
अरावली के दक्षिणी हिस्से उदयपुर–मेवाड़ क्षेत्र में वन्यजीव का इतिहास सिर्फ प्राकृतिक इतिहास नहीं, राजनीतिक और सामाजिक इतिहास भी है.
