शिमला | Himalayan Dawn Desk
हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों में अनुशासन और नैतिकता को ताक पर रखने वाले शिक्षकों के खिलाफ सुक्खू सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक शुरू कर दी है। शिक्षा विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि देवभूमि के शिक्षण संस्थानों में भ्रष्टाचार और दुराचार के लिए कोई जगह नहीं है। शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर की हालिया समीक्षा बैठक के बाद विभाग पूरी तरह से एक्शन मोड में नजर आ रहा है।
जांच के घेरे में 72 कर्मचारी, प्रधानाचार्यों की संख्या सबसे अधिक
विभागीय आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में 72 शिक्षक और गैर-शिक्षक कर्मचारी कड़े अनुशासनात्मक घेरे में हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि रडार पर आए इन कर्मचारियों में सबसे बड़ी संख्या स्कूल प्रधानाचार्यों (28) की है। इसके अलावा प्रवक्ताओं, टीजीटी, मुख्य अध्यापकों और डीपीई पर भी जांच की तलवार लटक रही है।
गंभीर आरोपों की फेहरिस्त
इन शिक्षकों पर लगे आरोप बेहद संगीन हैं, जो शिक्षा जगत को शर्मसार करने वाले हैं:
- पॉक्सो और यौन उत्पीड़न: 10 शिक्षकों पर पॉक्सो एक्ट और 3 पर यौन उत्पीड़न के मामले दर्ज हैं।
- नशा और लापरवाही: कुछ शिक्षकों पर शराब पीकर स्कूल आने और छात्रों के साथ मारपीट के आरोप हैं।
- भ्रष्टाचार: कई शिक्षक रिश्वतखोरी और सरकारी धन के गबन के मामलों में फंसे हैं।
- लापता शिक्षक: 7 ऐसे शिक्षक भी चिह्नित किए गए हैं जो बिना किसी सूचना के लंबे समय से ड्यूटी से नदारद हैं।
कड़ा प्रहार: बर्खास्तगी और जबरन रिटायरमेंट
शिक्षा मंत्री के सख्त निर्देशों के बाद पिछले दो महीनों में 11 शिक्षकों पर गाज गिरी है। विभाग ने उदाहरण पेश करते हुए निम्नलिखित कार्रवाइयां की हैं:
- बर्खास्तगी: छात्राओं के शारीरिक शोषण और उन्हें निजी काम के बहाने प्रताड़ित करने वाले इतिहास के एक प्रवक्ता को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है।
- जबरन रिटायरमेंट: रिश्वत मांगते हुए ऑडियो वायरल होने और दोष सिद्ध होने पर गणित के एक प्रवक्ता (पूर्व आईसीटी लैब प्रभारी) को समय से पहले रिटायर कर घर भेज दिया गया है।
शिक्षा मंत्री का संदेश:
“शिक्षण संस्थानों की गरिमा से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जांच में तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं और दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।”
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