हिमालयन डॉन संवाददाता, शिमला: राजधानी शिमला की आर्थिकी में रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले श्रमिक समुदाय—’कश्मीरी खान’ (कुली)—के स्वास्थ्य और कल्याण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। मुंबई स्थित प्रसिद्ध संस्था ‘काश फाउंडेशन’ द्वारा शिमला के लोअर बाज़ार स्थित जामा मस्जिद परिसर में पहली बार एक विशेष निःशुल्क चिकित्सा एवं जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया।
हाशिए पर खड़े श्रमिकों को मिली आवाज़
यह शिविर विशेष रूप से उन कश्मीरी खानों के लिए समर्पित था जो अपनी पीठ पर भारी बोझ ढोकर शहर की रसद व्यवस्था को सुचारु रखते हैं, लेकिन अक्सर मूलभूत सुविधाओं और स्वास्थ्य लाभ से वंचित रह जाते हैं। गरीबी और जागरूकता के अभाव के कारण यह समुदाय अक्सर अपनी शारीरिक तकलीफों को नज़रअंदाज़ करता रहा है।
सर्वेक्षण से निकली शिविर की योजना
इस शिविर की पृष्ठभूमि काश फाउंडेशन के संस्थापक-ट्रस्टी डॉ. अवकाश जाधव के एक गहन शोध पर आधारित है। डॉ. जाधव ने भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS), राष्ट्रपति निवास में अपनी एसोसिएट फेलोशिप के दौरान 5 अप्रैल से 21 अप्रैल 2026 तक शिमला के 100 से अधिक कश्मीरी खानों का विस्तृत सर्वेक्षण किया था। इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों को 24 अप्रैल को IIAS में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किया गया, जिसमें इस श्रमिक वर्ग की गंभीर समस्याओं को उजागर किया गया था।
विशेषज्ञों ने दी स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं की जानकारी
शिविर की अध्यक्षता आईजीएमसी (IGMC) शिमला के सामुदायिक चिकित्सा विभाग के सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नरेंद्र महाजन ने की। इस दौरान संसाधन व्यक्ति के रूप में उपस्थित डॉ. मोहम्मद शहनवाज़ हसन ने 30 से अधिक कश्मीरी खानों को संबोधित करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारी दी:
- शारीरिक देखभाल: भारी काम के कारण होने वाले मांसपेशियों में ऐंठन, घुटनों और रीढ़ के दर्द से बचने के लिए प्रभावी फिजियोथेरेपी व्यायाम और सुझाव।
- बीमारियों की पहचान: पुरानी बीमारियों के लक्षणों को समय पर पहचानने और हर छह माह में स्वास्थ्य जांच की अनिवार्यता।
- सरकारी योजनाएं: केंद्र सरकार के आयुष्मान भारत कार्ड और प्रदेश सरकार के हिमकेयर कार्ड के लाभ तथा इन्हें प्राप्त करने की विस्तृत प्रक्रिया।
मुफ्त उपचार और भविष्य का आश्वासन
डॉ. नरेंद्र महाजन ने इस अवसर पर एक बड़ी घोषणा करते हुए काली बाड़ी मंदिर के पास स्थित अपने चैरिटी क्लिनिक में इन श्रमिकों के लिए निःशुल्क परामर्श और सामान्य दवाओं की पेशकश की। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि वे आईजीएमसी में व्यक्तिगत स्तर पर सहायता कर इनके रक्त परीक्षण और अन्य जांचें निःशुल्क करवाने में मदद करेंगे।
संवाद और संवेदना
काश फाउंडेशन के संस्थापक डॉ. अवकाश जाधव ने संस्था द्वारा महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में किए जा रहे सामाजिक कार्यों की जानकारी दी। शिविर में मौजूद कश्मीरी खान कुली मुश्ताक ने भावुक होते हुए कहा, “ऐसा लगा कि हमारी भी जिंदगी बेहतर बन सकती है। इस कैंप के कारण हमारी तकलीफों को पहली बार जुबान मिली है।”
इस सफल आयोजन ने न केवल इन श्रमिकों को तात्कालिक चिकित्सा राहत प्रदान की, बल्कि उन्हें राज्य और केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से जोड़कर एक सुरक्षित भविष्य की उम्मीद भी जगाई है।
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