सोलन नगर निगम चुनाव 2026 में कांग्रेस और बीजेपी के बागी नेताओं का प्रदर्शन और टिकट विवाद का ग्राफिकल चित्रण।

सोलन नगर निगम चुनाव: टिकट बंटवारे ने लगाई ‘बगावत’ की आग; क्या अपनों की सेंधमारी बिगाड़ देगी कांग्रेस-BJP का खेल?

Solan

हिमालयन डॉन, सोलन | नगर निगम चुनावों की बिसात बिछते ही सोलन की राजनीति में ‘अपनों’ ने ही मोर्चे खोल दिए हैं। टिकट वितरण के बाद कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ही खेमों में असंतोष का ज्वालामुखी फूट पड़ा है। बागी नेताओं के निर्दलीय ताल ठोकने से अब मुकाबला केवल दो दलों के बीच नहीं, बल्कि ‘अपनों बनाम खास’ के बीच त्रिकोणीय और बेहद पेचीदा हो गया है।

कांग्रेस को बड़ा झटका: निवर्तमान मेयर ऊषा शर्मा ने दिखाए कड़े तेवर

​कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी मुसीबत निवर्तमान मेयर ऊषा शर्मा का बागी होना साबित हो रहा है। पार्टी ने इस बार उनका पत्ता काटकर ईश्वर दत्त पर दांव खेला है। इससे आक्रोशित ऊषा शर्मा ने इसे एक ‘साजिश’ करार देते हुए निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है।

​”मेयर पद की ईमानदारी से सेवा करने की कीमत मुझे टिकट कटने के रूप में चुकानी पड़ रही है।” — ऊषा शर्मा (बागी उम्मीदवार)

विवादों और कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट से राहत पाकर मेयर की कुर्सी बचाने वाली ऊषा शर्मा का मैदान में उतरना कांग्रेस के वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकता है।

बीजेपी में भी बगावत की ‘डबल डोज’

भगवा खेमे में भी स्थिति नियंत्रण से बाहर दिख रही है। पार्टी ने गौरव राजपूत का टिकट काटकर पीयूष गर्ग को उम्मीदवार बनाया, जिसके जवाब में गौरव ने तो नामांकन भरा ही, साथ ही उनकी पत्नी ने भी वार्ड-3 से निर्दलीय पर्चा दाखिल कर पार्टी नेतृत्व को सकते में डाल दिया है।

बीजेपी के अन्य प्रमुख बागी चेहरे:

  • वार्ड 10: विवेक डोभाल (वीरेंद्र सूद को टिकट मिलने से नाराज)।
  • वार्ड 9: सुमन साहनी।
  • वार्ड 12: विधि चंद शर्मा।
  • वार्ड 1: चंद्रकांता।
क्या ‘बागी फैक्टर’ बनेगा किंगमेकर?

​राजनीतिक पंडितों की मानें तो इस बार सोलन नगर निगम के नतीजों में विकास के मुद्दों से ज्यादा ‘बागी फैक्टर’ हावी रहने वाला है।

दलमुख्य चुनौतीसंभावित असर
कांग्रेसऊषा शर्मा की बगावतमेयर के व्यक्तिगत वोट बैंक का नुकसान
बीजेपीकई वार्डों में सामूहिक विद्रोहकैडर वोटों का बिखराव

हिमालयन डॉन का विश्लेषण: दोनों ही दलों के अधिकृत उम्मीदवारों के लिए अब बाहरी से ज्यादा घर के भीतर की चुनौती भारी पड़ रही है। वोटों का यह बंटवारा किसके लिए सत्ता का रास्ता खोलेगा और किसे धूल चटाएगा, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन एक बात साफ है— सोलन की चुनावी जंग अब व्यक्तिगत स्वाभिमान की लड़ाई बन चुकी है।

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