रेणुका जी बांध

नाहन: हिमाचल प्रदेश की महत्वपूर्ण और बहुउद्देशीय श्री रेणुका जी बांध परियोजना एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। पिछले 17 सालों से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे विस्थापित परिवारों का गुस्सा फूट पड़ा है। श्री रेणुका जी बांध विस्थापित संघर्ष समिति ने जिला प्रशासन के माध्यम से सरकार को चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को जल्द पूरा नहीं किया गया, तो यह आंदोलन उग्र रूप धारण करेगा।

पुश्तैनी जमीनें दीं, बदले में मिला सिर्फ आश्वासन

विस्थापित संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने डीसी सिरमौर प्रियंका वर्मा को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। समिति के अध्यक्ष विजय ठाकुर और महासचिव शुभम अत्री ने कहा कि राष्ट्रहित के नाम पर विस्थापितों ने अपनी उपजाऊ और पुश्तैनी जमीनें देश को समर्पित कर दीं, लेकिन बदले में उन्हें केवल सरकारी फाइलों और आश्वासनों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। 17 वर्ष बीत जाने के बाद भी पुनर्वास और पुनर्स्थापन की प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है।

300 परिवारों का भविष्य दांव पर: पुरानी नीतियों पर सवाल

समिति के अनुसार, लगभग 300 परिवार सीधे तौर पर इस बांध निर्माण से प्रभावित हो रहे हैं। HPPCL (हिमाचल प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन) की पुनर्वास योजना 5.2 के तहत विस्थापितों को घर बनाने के लिए अधिकतम 28.5 लाख रुपये की सहायता का प्रावधान है। लेकिन विस्थापितों का तर्क है कि सिरमौर का भौगोलिक क्षेत्र पहाड़ी है, जहां समतल भूमि मिलना नामुमकिन है।

समिति की प्रमुख आपत्तियां:

  1. पहाड़ी क्षेत्र की चुनौतियां: पहाड़ी को काटकर घर के लिए जमीन तैयार करने में ही लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं। ऐसे में 150 वर्ग मीटर के एक मंजिला मकान की शर्त विस्थापितों के लिए व्यावहारिक नहीं है।
  2. बहुमंजिला मकानों की मांग: समिति ने मांग की है कि नीति में संशोधन किया जाए। यदि कोई परिवार जमीन की कमी के कारण बहुमंजिला मकान बनाता है, तो उसकी हर मंजिल के क्षेत्रफल को जोड़कर 150 वर्ग मीटर माना जाए और पूरी अनुदान राशि दी जाए।
  3. पुराने रेट बनाम महंगाई: हाउसलेस ग्रांट के रूप में दी जाने वाली 27 लाख रुपये की राशि साल 2008 के मूल्यांकन पर आधारित है। आज के समय में निर्माण सामग्री (सीमेंट, सरिया, लेबर) के दाम कई गुना बढ़ चुके हैं। विस्थापितों की मांग है कि इसे PWD के वर्तमान शेड्यूल रेट्स के आधार पर बढ़ाया जाए।
प्रशासनिक भवन के बाहर गूंजे नारे

ज्ञापन सौंपने से पहले सैकड़ों विस्थापितों ने उपायुक्त कार्यालय परिसर में जोरदार नारेबाजी की। विस्थापितों का कहना है कि 250 वर्ग मीटर प्लॉट के लिए दी जाने वाली 1.50 लाख रुपये की राशि आज के बाजार मूल्य के हिसाब से ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ के समान है।

समिति की दो टूक: अब और बर्दाश्त नहीं

कोषाध्यक्ष सुखचैन ठाकुर और प्रेस सचिव योगी ठाकुर सहित अन्य सदस्यों ने स्पष्ट किया कि विस्थापित परिवार खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उन्होंने प्रशासन को अल्टीमेटम दिया है कि पुनर्वास नीति की शर्तों को सरल बनाया जाए और बिना किसी देरी के मुआवजा राशि जारी की जाए।

श्री रेणुका जी बांध परियोजना न केवल बिजली उत्पादन बल्कि दिल्ली जैसे शहरों की प्यास बुझाने के लिए भी महत्वपूर्ण है। लेकिन जिन लोगों ने अपनी जमीनें इसके लिए कुर्बान कीं, उनकी अनदेखी विकास के मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अब देखना यह होगा कि सरकार और जिला प्रशासन इन विस्थापितों के जख्मों पर मरहम लगाता है या यह विरोध प्रदर्शन और तेज होता है।

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